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यह देखा जाता है कि
मनुष्य अपने ज़ेह्न में ब्रह्मांड की प्रत्येक वस्तु से
परिचित है। जिसे हम स्मृति कहते हैं, वह हर देखी हुई वस्तु और हर सुनी हुई बात को याद रखती है। जिन वस्तुओं से हम
परिचित नहीं हैं, हमारे ज़ेह्न में उनसे परिचय प्राप्त करने की जिज्ञासा विद्यमान है। यदि इस जिज्ञासा का विश्लेषण किया जाए
तो अनेक आत्मिक क्षमताओं का उद्घाटन होता है। यही जिज्ञासा वह क्षमता है जिसके माध्यम से हम ब्रह्मांड के प्रत्येक अंश से
परिचित हो जाते हैं। इस शक्ति की क्षमताएँ इतनी व्यापक हैं कि जब इनसे कार्य लिया
जाए तो यह ब्रह्मांड की उन सभी सृष्टियों से परिचित हो जाती हैं, जो पहले कभी थीं, अब हैं या भविष्य में होंगी। परिचित होने के लिए
हमारा ज़ेह्न जिज्ञासा करता है। जिज्ञासा उस गति का नाम है जो पूरे ब्रह्मांड का आवरण किए हुए है। कुरआन पाक में आता है: “اَلَا اِنَّہٗ بِکُلِّ شَیْ ءٍ مُّحِیْط -अला इन्नहू बिकुल्लि शैई मुँहीत”, अर्थात् ईश्वर हर चीज़ को आवृत करने वाली गुण रखते हैं। इस गुण का प्रतिबिंब
मनुष्य की आत्मा में पाया जाता है। इसी प्रतिबिंब के माध्यम से मनुष्य का अवचेतन या अतिचेतन (तहत-लाशउर) रूया के लोक में ब्रह्मांड की प्रत्येक वस्तु से परिचित होता है।